11 Public economic (एलन टी. पीकॉक, जैक वाइजमैन, जे.के. मेहता और एल.एम.डी. लिटिल)

चार अर्थशास्त्री: पीकॉक, वाइजमैन, मेहता, लिटिल

📊 सार्वजनिक व्यय एवं विस्थापन प्रभाव (Public Expenditure & Displacement Effect) तथा अन्य सामान्य अर्थशास्त्री

बिल्कुल, मैं अब एलन टी. पीकॉक, जैक वाइजमैन, जे.के. मेहता और एल.एम.डी. लिटिल – इन चारों को ठीक उसी फॉर्मेट में समझा रहा हूँ, जैसे ऊपर समझाया था।
सार्वजनिक व्यय एवं विस्थापन प्रभाव (Public Expenditure & Displacement Effect) तथा अन्य सामान्य अर्थशास्त्री (Other General Economists) – यह उनका मुख्य क्षेत्र है।

42. एलन टी. पीकॉक (Alan T. Peacock) – 1922–2014

📖 प्रमुख पुस्तक / लेख

पुस्तक/लेख का नामप्रकाशन वर्षकिस समय लिखा?
"The Growth of Public Expenditure in the United Kingdom" (जैक वाइजमैन के साथ)1961द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद के पुनर्निर्माण काल (post-war reconstruction) के बाद, जब यूरोप में सार्वजनिक व्यय (public expenditure) बहुत तेज़ी से बढ़ गया था, और अर्थशास्त्री यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि यह वृद्धि स्थायी है या अस्थायी।

📘 मुख्य थ्योरी: डिस्प्लेसमेंट इफेक्ट (Displacement Effect) – पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना

"युद्ध, महामारी या बड़े आर्थिक संकट के समय सरकारी खर्च बढ़ जाता है। संकट खत्म होने के बाद भी यह पूरी तरह पुराने स्तर पर नहीं लौटता – बल्कि एक नए, ऊँचे स्तर पर displace (विस्थापित) हो जाता है।"

पीकॉक और वाइजमैन ने UK के आंकड़ों (1890-1955) का विश्लेषण करके यह निष्कर्ष निकाला।

📘 तीन प्रभाव (Three Effects):

प्रभाव (Effect)सरल भाषाउदाहरण
विस्थापन प्रभाव (Displacement Effect)संकट (युद्ध, महामारी) के दौरान सरकारी खर्च छलांग लगाता है, और संकट बीतने के बाद भी पुराने स्तर पर नहीं लौटता – यानी नए ऊँचे स्तर पर displace हो जाता है।UK में प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) से पहले सरकारी खर्च GDP का ~12% था; युद्ध के बाद ~22% पर स्थिर हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ~35% पर displace हुआ।
निरीक्षण प्रभाव (Inspection Effect)संकट के दौरान लोग यह देख लेते हैं कि सरकार क्या-क्या सेवाएँ (राशन, स्वास्थ्य, राहत, सुरक्षा) उपलब्ध करा सकती है – संकट बीतने के बाद भी वे उन सेवाओं की माँग करते रहते हैं।कोविड-19 (2020-21) के दौरान सरकार ने मुफ्त राशन (PDS) दिया – महामारी बीतने के बाद भी लोग कहते हैं कि राशन जारी रहे।
संकेंद्रण प्रभाव (Concentration Effect)संकट के समय केंद्र सरकार की भूमिका और खर्च राज्य सरकारों की तुलना में तेजी से बढ़ता है।कोविड में केंद्र ने स्वास्थ्य सुविधाएँ, वैक्सीन, आर्थिक पैकेज, राशन, रोजगार गारंटी पर अधिक खर्च किया – राज्यों से अधिक।

📘 उदाहरण (कोविड-19 – भारत/विश्व):

समय अवधिसरकारी खर्च (लगभग)क्यों?
2019 (पहले)₹100 (मान लीजिए)सामान्य स्थिति
2020-21 (कोविड)₹150मुफ्त राशन, स्वास्थ्य सुविधाएँ, वैक्सीन, राहत पैकेज, MSME लोन।
2022-23 (कोविड के बाद)₹130 (₹100 पर वापस नहीं गया)मुफ्त राशन बंद हुआ, पर कुछ योजनाएँ जारी रहीं + स्वास्थ्य बजट बढ़ा + खाद्य सब्सिडी बढ़ी।

₹100 → ₹150 → ₹130 – यहाँ ₹130 नया स्तर है; पुराना ₹100 displace होकर नए स्तर पर पहुँच गया।

⚠️ आलोचनाएँ (Criticism)
कमीस्पष्टीकरण
केवल UK के आंकड़ों पर आधारित1890-1955 के यूके के आंकड़े – दूसरे देशों (संयुक्त राज्य, फ्रांस, जर्मनी, भारत) में क्या पैटर्न है, इसकी पुष्टि नहीं की।
केवल युद्ध और युद्ध-जैसे संकटशांतिकाल में भी तकनीकी प्रगति, जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, बढ़ती उम्मीदें (rising aspirations) से सरकारी खर्च बढ़ सकता है – पीकॉक-वाइजमैन ने इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
वैगनर के नियम (Wagner's Law) से अंतर करना मुश्किलवैगनर कहते हैं – विकास के साथ सरकारी खर्च लगातार बढ़ता है (सुचारू रूप से)। पीकॉक-वाइजमैन कहते हैं – छलाँगों (stepwise) में बढ़ता है। वास्तविक आँकड़ों में दोनों प्रभाव एक साथ दिखते हैं – अलग करना मुश्किल।

🔁 आगे किसने बढ़ाया?

अर्थशास्त्री/संस्थानयोगदान
वैगनर (Adolph Wagner)वैगनर का नियम (Wagner's Law) – दीर्घकालिक (long-term) व्यय वृद्धि का सिद्धांत।
अनुभवजन्य अध्ययन (Empirical Studies)विश्व बैंक, IMF, OECD ने 1970-2020 के आँकड़ों पर पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना का परीक्षण किया – मिश्रित परिणाम (कुछ देशों में displacement effect मिला, कुछ में नहीं)।
✅ अतिरिक्त आवश्यक बातें
· एलन टी. पीकॉक ब्रिटिश अर्थशास्त्री थे – उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ बकिंघम (University of Buckingham) के वाइस-चांसलर के रूप में कार्य किया।
· वे स्कॉटिश इकोनॉमिक सोसाइटी (Scottish Economic Society) के अध्यक्ष भी रहे।
· परीक्षा ट्रिक: "Peacock – Displacement effect: संकट के बाद खर्च पहले से ऊँचा रह जाता है"

43. जैक वाइजमैन (Jack Wiseman) – 1919–1991

📖 प्रमुख पुस्तक / लेख

पुस्तक/लेख का नामप्रकाशन वर्षकिस समय लिखा?
"The Growth of Public Expenditure in the United Kingdom" (एलन पीकॉक के साथ)1961द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद के पुनर्निर्माण काल के बाद, जब यूरोप में सार्वजनिक व्यय बहुत तेज़ी से बढ़ गया था।

📘 मुख्य थ्योरी: डिस्प्लेसमेंट इफेक्ट (Displacement Effect) – पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना

"युद्ध, महामारी या बड़े आर्थिक संकट के समय सरकारी खर्च बढ़ जाता है। संकट खत्म होने के बाद भी यह पूरी तरह पुराने स्तर पर नहीं लौटता – बल्कि एक नए, ऊँचे स्तर पर displace (विस्थापित) हो जाता है।"

जैक वाइजमैन (एलन पीकॉक के सह-लेखक) ने UK के सार्वजनिक व्यय (1890-1955) का विश्लेषण करने और विस्थापन प्रभाव (displacement effect) को प्रतिपादित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि यह परिकल्पना दोनों के संयुक्त कार्य का परिणाम है, वाइजमैन को सार्वजनिक व्यय के संस्थागत (institutional) और ऐतिहासिक विश्लेषण में विशेष रुचि थी।

📘 तीन प्रभाव (Three Effects) – जैसा पीकॉक के अनुभाग में समझाया गया है:

प्रभाव (Effect)सरल भाषाउदाहरण
विस्थापन प्रभाव (Displacement Effect)संकट के समय सरकारी खर्च छलांग लगाता है, और संकट बीतने के बाद पुराने स्तर पर वापस नहीं लौटता।UK में द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के बाद सरकारी खर्च GDP के 25% से बढ़कर 35% हो गया, और फिर कभी 25% पर वापस नहीं लौटा।
निरीक्षण प्रभाव (Inspection Effect)संकट के दौरान लोग यह देख लेते हैं कि सरकार क्या-क्या सेवाएँ दे सकती है – संकट बीतने के बाद भी वे उन सेवाओं की माँग करते रहते हैं।भारत में कोविड के बाद लोग सरकार से 'मुफ्त राशन' और 'स्वास्थ्य सुविधाएँ' जारी रखने की माँग कर रहे हैं।
संकेंद्रण प्रभाव (Concentration Effect)संकट के समय केंद्र सरकार की भूमिका और खर्च राज्य सरकारों की तुलना में तेजी से बढ़ता है।कोविड में केंद्र सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत पैकेज' (₹20 लाख करोड़), स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचा, वैक्सीन खरीद, और राशन पर अधिक खर्च किया।

📘 उदाहरण (भारत के कुछ संकट और व्यय):

संकटसमय अवधिखर्च में छलांग (विस्थापन)
युद्ध (1965, 1971)1965-71रक्षा व्यय (Defence expenditure) बहुत बढ़ा; युद्ध के बाद भी बढ़ा ही रहा।
तेल की कीमतों में उछाल (1973, 1979)1973-80उर्वरक, खाद्य, पेट्रोलियम सब्सिडी बहुत बढ़ी; बाद में भी कम नहीं हुई।
कोविड-19 (2020)2020-22स्वास्थ्य, राशन, MSME सपोर्ट, मुफ्त अनाज – खर्च GDP के अनुपात में बहुत बढ़ा।
⚠️ आलोचनाएँ (Criticism) – पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना की (जैसा पीकॉक के अनुभाग में)
कमीस्पष्टीकरण
केवल UK के आंकड़ों पर आधारितअन्य देशों (फ्रांस, जर्मनी, भारत, ब्राजील) में यह पैटर्न जरूरी नहीं मिलता।
शांतिकाल में भी व्यय बढ़ सकता हैकेवल युद्ध/महामारी ही नहीं, बल्कि जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, तकनीकी प्रगति, बढ़ती अपेक्षाएँ भी व्यय बढ़ाती हैं।
वैगनर के नियम (Wagner's Law) से अलग करना मुश्किलवैगनर का नियम कहता है – विकास के साथ व्यय लगातार बढ़ता है। पीकॉक-वाइजमैन कहते हैं – छलाँगों में बढ़ता है। असल डेटा में दोनों एक साथ दिखते हैं, अलग करना मुश्किल।

🔁 आगे किसने बढ़ाया?

अर्थशास्त्री/संस्थानयोगदान
वैगनर (Adolph Wagner)दीर्घकालिक (long-run) व्यय वृद्धि का सिद्धांत (Wagner's Law)।
अनुभवजन्य अध्ययन (OECD, World Bank)विकसित और विकासशील देशों में डिस्प्लेसमेंट इफेक्ट का परीक्षण।
✅ अतिरिक्त आवश्यक बातें
· जैक वाइजमैन ब्रिटिश अर्थशास्त्री थे – उन्होंने यॉर्क विश्वविद्यालय (University of York) में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।
· उन्हें सार्वजनिक व्यय के संस्थागत विश्लेषण (institutional analysis) के लिए जाना जाता है।
· परीक्षा ट्रिक: "Wiseman – Peacock के साथ displacement effect, संकट के बाद खर्च बढ़ा रहता है"

44. जे.के. मेहता (J.K. Mehta) – 1901–1982

📖 प्रमुख पुस्तक / लेख

पुस्तक/लेख का नामप्रकाशन वर्षकिस समय लिखा?
"The Economics of the State" (प्रमुख पुस्तक)1930-40 के दशक1930 के दशक की महामंदी (Great Depression) के दौरान और बाद में, जब अर्थशास्त्री पूर्ण रोजगार (full employment), अल्प-रोजगार संतुलन (under-employment equilibrium), और सरकार की भूमिका पर पुनर्विचार कर रहे थे।

📘 मुख्य योगदान: प्रगतिशील आयकर (Progressive Income Tax), अल्प-रोजगार संतुलन (Under-employment Equilibrium)

जे.के. मेहता एक भारतीय अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने प्रगतिशील आयकर (progressive income tax) और अल्प-रोजगार संतुलन (under-employment equilibrium) के सिद्धांतों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

📘 प्रगतिशील आयकर (Progressive Income Tax) पर विचार:

अवधारणासरल भाषाउदाहरण
प्रगतिशील आयकर (Progressive Income Tax)आय बढ़ने पर कर की दर (tax rate) बढ़ती है।₹2 लाख आय पर 5%, ₹10 लाख आय पर 20%।
आय अंतर कम करने का प्रभावी उपकरणअमीर से अधिक कर लेकर गरीबों को हस्तांतरण (transfer payments) करें – इससे आय असमानता (income inequality) कम होती है।भारत में आयकर स्लैब – ₹2-5 लाख पर 5%, ₹5-10 लाख पर 20%, ₹10 लाख से अधिक पर 30%।

📘 अल्प-रोजगार संतुलन (Under-employment Equilibrium) पर विचार:

अवधारणासरल भाषाउदाहरण
अल्प-रोजगार संतुलन (Under-employment Equilibrium)अर्थव्यवस्था कुछ लोगों के बेरोज़गार (unemployed) होने पर भी संतुलन (equilibrium) में हो सकती है – बिना किसी स्वचालित सुधार के।महामंदी (1930) में US में बेरोजगारी 25% थी – केन्स से पहले मेहता (और अन्य) ने यह दिखाया था।
पूर्ण रोजगार (Full Employment) स्वचालित नहींक्लासिकल अर्थशास्त्रियों (Adam Smith, J.S. Mill) का मानना था कि बाजार अपने आप पूर्ण रोजगार की ओर जाता है। मेहता (और केन्स) ने इसे गलत सिद्ध किया।1990 के दशक में भारत में बेरोजगारी बनी रही; 2000-2020 में भी बेरोजगारी समाप्त नहीं हुई।
⚠️ आलोचनाएँ (Criticism)
कमीस्पष्टीकरण
केन्स से पहले का कार्य, पर्याप्त प्रसिद्ध नहीं हुआजे.के. मेहता ने 1930 के दशक में 'अल्प-रोजगार संतुलन' की अवधारणा दी थी, लेकिन उनका कार्य केन्स (1936) जितना प्रभावशाली नहीं रहा।
प्रगतिशील आयकर पर व्यापक सैद्धांतिक ढाँचा नहींउन्होंने प्रगतिशील आयकर का समर्थन तो किया, लेकिन इष्टतम कराधान (optimal taxation) का गणितीय मॉडल नहीं दिया – जो बाद में मैन्किव, मिर्लीस, डायमंड ने किया।
कम अंतर्राष्ट्रीय पहचानउनके कार्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उतना पढ़ा या उद्धृत नहीं गया, जितना केन्स, हिक्स, सैमुएलसन को।

🔁 आगे किसने बढ़ाया?

अर्थशास्त्रीयोगदान
J.M. Keynes (1936)अल्प-रोजगार संतुलन (under-employment equilibrium) की अवधारणा को 'General Theory' में पूर्ण विकसित किया।
Nicholas Kaldorप्रगतिशील कर और व्यय कर (expenditure tax) पर आगे का कार्य किया।
✅ अतिरिक्त आवश्यक बातें
· जे.के. मेहता इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad) में प्रोफेसर रहे।
· वे बिहार विधान परिषद (Bihar Legislative Council) के सदस्य भी रहे।
· उन्होंने 'द इकोनॉमिक्स ऑफ द स्टेट (The Economics of the State)' जैसी पुस्तकें लिखीं।
· परीक्षा ट्रिक: "Mehta – Progressive tax समर्थक, under-employment equilibrium के समर्थक (केन्स से पहले)"

45. एल.एम.डी. लिटिल (L.M.D. Little) – 1918–2006

📖 प्रमुख पुस्तक / लेख

पुस्तक/लेख का नामप्रकाशन वर्षकिस समय लिखा?
"A Critique of Welfare Economics" (प्रमुख पुस्तक)1950 (पहला संस्करण); बाद के संस्करण 1957, 1960 के दशक में।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब कल्याण अर्थशास्त्र (welfare economics) में नए सिरे से मूल्यांकन (reassessment) और यथार्थवादी (realistic) मापदंडों की आवश्यकता महसूस हुई।
"The Economics of Development" (J.A. Mirrlees के साथ)1960-70 के दशकविकासशील देशों (developing countries) में नियोजन (planning) और लागत-लाभ विश्लेषण (cost-benefit analysis) को लागू करने के लिए।

📘 मुख्य योगदान: कल्याण अर्थशास्त्र (Welfare Economics), लागत-लाभ विश्लेषण (Cost-Benefit Analysis)

एल.एम.डी. लिटिल (Ian Malcolm David Little) एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने कल्याण अर्थशास्त्र (welfare economics) और विकास अर्थशास्त्र (development economics) में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से, उन्होंने लागत-लाभ विश्लेषण (cost-benefit analysis) को विकासशील देशों में बड़ी परियोजनाओं (जैसे बाँध, सड़क, बिजली संयंत्र) के मूल्यांकन के लिए एक व्यावहारिक उपकरण के रूप में विकसित किया।

📘 मुख्य अवधारणाएँ:

अवधारणासरल भाषाउदाहरण लागत-लाभ विश्लेषण (Cost-Benefit Analysis – CBA)किसी परियोजना (जैसे बाँध, सड़क, बिजली संयंत्र) के सभी लागतों (costs) और लाभों (benefits) को पैसे में मापकर देखना – अगर लाभ > लागत, तो परियोजना स्वीकार करें।नर्मदा बाँध परियोजना (सरदार सरोवर) – बिजली उत्पादन और सिंचाई लाभ; पर्यावरण क्षति, विस्थापित लोगों की लागत – दोनों का मूल्यांकन। छाया मूल्य (Shadow Prices)बाजार मूल्य (market price) सही न हो (उदाहरण: सरकारी सब्सिडी, बेरोज़गारी) – तो हम 'छाया मूल्य' (सही सामाजिक लागत/लाभ) का उपयोग करें।अगर बेरोज़गारी अधिक है, तो एक श्रमिक की अवसर लागत (opportunity cost) शून्य या कम होती है – CBA में उसे बाजार मजदूरी से कम पर आंकें। कल्याण अर्थशास्त्र की आलोचना (Critique of Welfare Economics)पिगू, बर्गसन, सैमुएलसन, हिक्स, कलडोर द्वारा प्रस्तावित कल्याण अर्थशास्त्र के मापदंड (Pareto optimality, compensation principle) अपर्याप्त हैं – वास्तविक दुनिया में लागू करना मुश्किल।एक परियोजना अमीरों को लाभ और गरीबों को नुकसान पहुँचा सकती है – भले ही कलडोर-हिक्स कसौटी (कुल लाभ > कुल हानि) पूरी हो जाए।

📘 उदाहरण (सरदार सरोवर बाँध पर CBA – मान लीजिए):

लागत (Costs)लाभ (Benefits)
निर्माण लागत (₹50,000 करोड़)बिजली उत्पादन (₹30,000 करोड़)
विस्थापित लोगों की लागत (आर्थिक, सामाजिक – ₹10,000 करोड़)सिंचाई लाभ (₹25,000 करोड़)
पर्यावरण क्षति (वन, नदी पारिस्थितिकी – ₹5,000 करोड़)बाढ़ नियंत्रण (₹5,000 करोड़)
कुल लागत: ₹65,000 करोड़कुल लाभ: ₹60,000 करोड़

यदि लाभ (₹60k) < लागत (₹65k), तो परियोजना अस्वीकार करें (संख्याएँ उदाहरण मात्र हैं)।
यदि बेरोज़गारी अधिक है, तो हम छाया मूल्य (shadow price) लगाकर श्रमिकों की लागत कम आंक सकते हैं – तब लाभ > लागत दिख सकता है।

⚠️ आलोचनाएँ (Criticism)
कमीस्पष्टीकरण
लागत-लाभ विश्लेषण में मूल्यांकन (valuation) समस्याएँमानव जीवन, जैव विविधता (biodiversity), सांस्कृतिक विरासत (cultural heritage) को पैसे में नहीं मापा जा सकता। विस्थापित लोगों का दर्द, गैर-प्रयोग मूल्य (non-use value) – ये CBA के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
आय वितरण (distribution) पर अपर्याप्त ध्यानCBA केवल कुल लाभ और कुल लागत देखता है – यह नहीं देखता कि लाभ अमीरों को मिला या गरीबों को, नुकसान किसे हुआ (वितरण प्रभाव – distributional effect)।
छाया मूल्य (shadow prices) का निर्धारण मुश्किलबाजार मूल्य न होने पर सही छाया मूल्य निकालना बहुत मुश्किल है – विभिन्न अर्थशास्त्री अलग-अलग छाया मूल्य निकाल सकते हैं, जिससे परिणाम बदल जाता है।

🔁 आगे किसने बढ़ाया?

अर्थशास्त्री/संस्थानयोगदान
A.C. Pigou, J.R. Hicks, N. Kaldorकल्याण अर्थशास्त्र के शुरुआती सिद्धांतकार।
P. Dasgupta, A. Sen, J. Stiglitzलिटिल के कार्य को आगे बढ़ाते हुए, वितरण (distribution) और गरीबी (poverty) पर अधिक ध्यान दिया।
World Bank, ADB, UNDPविकास परियोजनाओं (बाँध, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा) में लागत-लाभ विश्लेषण (CBA) का व्यापक उपयोग करती हैं।
✅ अतिरिक्त आवश्यक बातें
· एल.एम.डी. लिटिल ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे।
· उन्होंने UK सरकार और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (OECD, IDRC) के लिए सलाहकार के रूप में कार्य किया।
· परीक्षा ट्रिक: "Little – Cost-Benefit Analysis (CBA), Shadow Prices, Critique of Welfare Economics"

🧠 परीक्षा के लिए अतिरिक्त तथ्य (Exam Booster Table)

नामपुस्तक/योगदानवर्षट्रिक (एक लाइन में याद रखें)
Alan T. PeacockDisplacement Effect (with Wiseman)1961"Peacock – संकट के बाद खर्च बढ़ा रहता है, पुराने स्तर पर नहीं लौटता"
Jack WisemanDisplacement Effect (with Peacock)1961"Wiseman – Peacock के साथ displacement effect"
J.K. MehtaProgressive Tax, Under-employment Equilibrium1930-40"Mehta – Progressive tax समर्थक, केन्स से पहले under-employment वाले"
L.M.D. LittleCost-Benefit Analysis, Welfare Economics1950-60"Little – CBA (लागत-लाभ), Shadow Prices"

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